बमों की बारीश,अक४७ की गोलिया,क्षत विक्षत लाशे,चारो तरफ़ अफरा तफरी...लेकिन मुंबई वासियों को भी दाद देनी होगी जिन्होंने देश की इस आर्थिक राजधानी को फिर से वही पुराना मुंबई में बदल दिया अपने दुःख गमो को भूल कर , आंतक वादियों के मनोबल को इससे ज्यादा कौन पायेगा,आंतक की दुनिया चाहती है की लोग दरव लेकिन जब लोग सब भूल कर फिर से रोजमर्रा के कम में लग गए तो उनकी आंतक की हवा निकल गई ,आतंकी लाख कोशिश करे लेकिन वे लोगो को दारा नही सकते उनकी जीवन की रफ्तार को कम नही कर सकते...